नॉमिनी, वसीयत या ट्रस्ट: पॉलिसी किसके नाम पर हो और कौन क्या जान पाएगा
अहमदाबाद के एक उद्योगपति परिवार में तीन बच्चे हैं, जिनमें से एक कारोबार चलाता है, एक लंदन में डॉक्टर है और एक का परिवार से संबंध तनावपूर्ण है। परिवार के मुखिया ने दुबई में रहते हुए एक PPLI पॉलिसी ली थी और अब भारत लौट आया है। बीमाकर्ता का फ़ॉर्म एक सरल प्रश्न पूछता है: लाभार्थी कौन होगा? उद्योगपति का प्रश्न उतना सरल नहीं है: मेरी मृत्यु के बाद इस पॉलिसी के बारे में कौन क्या जान पाएगा, और क्या वह तीसरा बच्चा इसे चुनौती दे सकेगा?
यह लेख उसी प्रश्न पर है। यह भारतीय कानून के तीन साधनों, नॉमिनी, वसीयत और ट्रस्ट, को एक विदेशी PPLI पॉलिसी के स्वामित्व और लाभार्थी की संरचना पर लागू करता है, और हर विकल्प में यह पूछता है कि उत्तराधिकारी, अदालत, लेनदार और जनता क्या देख पाएँगे। यह लेख गोपनीयता श्रेणी में है; भारतीय उत्तराधिकार कानून का व्यापक विवरण उत्तराधिकार नियोजन पृष्ठ पर है, और पारिवारिक विवाद में गोपनीयता की सीमाएँ पारिवारिक विवाद, तलाक और व्यापारिक साझेदार में। कर विभाग से गोपनीयता इस लेख का विषय नहीं है; पॉलिसी CRS और Schedule FA में दिखती है, और वह चर्चा CRS और Schedule FA में है।
भारत में उत्तराधिकार का प्रश्न कर का नहीं, प्रक्रिया का है
पहले वह बात जो इस पूरे लेख की पृष्ठभूमि है। भारत में संपदा शुल्क 16 मार्च 1985 के बाद की मृत्यु पर लागू नहीं है, विरासत कर नहीं है, और उपहार कर अधिनियम 1 अक्टूबर 1998 के बाद के उपहारों पर लागू नहीं होता; आयकर की धारा 56(2)(x) के तहत ₹ 50,000 से अधिक बिना प्रतिफल प्राप्त राशि प्राप्तकर्ता की आय है, लेकिन रिश्तेदारों से, वसीयत या विरासत से, या मृत्यु की प्रत्याशा में प्राप्त राशि उसके अपवाद में है। मृत्यु लाभ धारा 10(10D) के आठवें परंतुक के तहत कर-मुक्त है।
इसलिए नॉमिनी, वसीयत या ट्रस्ट का चुनाव भारत में कर बचाने का प्रश्न नहीं है। वह तीन दूसरे प्रश्नों का है: पैसा किसे और कितनी जल्दी मिलेगा; कौन उसे चुनौती दे सकेगा; और किस विकल्प में पॉलिसी का अस्तित्व, उसका मूल्य और लाभार्थियों की पहचान कितने लोगों की नज़र में आएगी।
विदेशी पॉलिसी पर कौन-सा कानून लागू है
एक ज़रूरी स्पष्टीकरण। Insurance Act 1938 और उसकी धारा 39 (नामांकन) भारत में कारोबार करने वाले बीमाकर्ताओं की पॉलिसियों पर लागू है। लक्ज़मबर्ग, सिंगापुर या बरमूडा के बीमाकर्ता की PPLI पॉलिसी में लाभार्थी की नियुक्ति उस पॉलिसी के अनुबंध और बीमाकर्ता के देश के कानून से चलती है, और वहाँ "beneficiary" की अवधारणा भारतीय "नॉमिनी" से अधिक मज़बूत होती है: लाभार्थी को भुगतान अनुबंध के तहत उसका अपना अधिकार है, केवल प्राप्त करने का अधिकार नहीं। लेकिन मृतक की संपदा और उसके भारतीय उत्तराधिकारियों के अधिकार भारतीय उत्तराधिकार कानून से चलते हैं, और यदि कोई उत्तराधिकारी भारतीय अदालत में यह दावा करे कि पॉलिसी मृतक की संपदा का हिस्सा थी, तो अदालत उस दावे को भारतीय कानून की नज़र से देखेगी। यह विश्लेषण है, और इसे हर मामले में विदेशी और भारतीय दोनों वकीलों से जँचवाना चाहिए। इस लेख में हम भारतीय नामांकन कानून को इसलिए समझाते हैं कि वही वह ढाँचा है जिससे भारतीय अदालतें और उत्तराधिकारी परिचित हैं।
पहला विकल्प: नॉमिनी
भारतीय बीमा में नॉमिनी की स्थिति का इतिहास दो चरणों में है। 1984 में सर्वोच्च न्यायालय ने Sarbati Devi v Usha Devi में, द्वितीयक स्रोतों के अनुसार, यह माना कि धारा 39 का नॉमिनी केवल भुगतान प्राप्त करने वाला है, स्वामी नहीं; पैसा कानूनी वारिसों का है और नॉमिनी उसे उनके लिए रखता है। इसका व्यावहारिक अर्थ यह था कि नामांकन उत्तराधिकार का साधन नहीं था, केवल भुगतान का पता।
Insurance Laws (Amendment) Act 2015 ने धारा 39 में उपधाराएँ (7) और (8) जोड़ीं, जिनके तहत माता-पिता, पति या पत्नी, या बच्चों को नॉमिनी बनाने पर वे "beneficial nominee" हैं और भुगतान पर उनका लाभकारी अधिकार है, जो ऐसे नॉमिनी के लिए Sarbati Devi की स्थिति को पलटता है। द्वितीयक स्रोतों के अनुसार उच्च न्यायालय इस प्रावधान के दायरे पर अब भी विभाजित हैं, और सर्वोच्च न्यायालय ने 2023 में Shakti Yezdani v Jayanand Salgaonkar में कंपनी शेयरों के लिए यह दोहराया कि नामांकन उत्तराधिकार का तरीका नहीं है। इसलिए भारतीय पॉलिसी में भी नॉमिनी की स्थिति "beneficial nominee" वाले रिश्तों में मज़बूत है और अन्य में विवादास्पद।
गोपनीयता की दृष्टि से नॉमिनी का रास्ता सबसे सरल है: बीमाकर्ता नॉमिनी को सीधे भुगतान करता है, कोई अदालत नहीं, कोई सार्वजनिक दस्तावेज़ नहीं। लेकिन उसकी सीमा भी वही है: यदि कोई वारिस यह दावा करे कि भुगतान संपदा का था, तो विवाद अदालत में जाएगा और वहाँ पॉलिसी का पूरा विवरण सामने आएगा। विदेशी PPLI में, जहाँ लाभार्थी का अनुबंधीय अधिकार भारतीय नॉमिनी से मज़बूत है, यह जोखिम कम है, समाप्त नहीं।
दूसरा विकल्प: वसीयत और probate
यदि पॉलिसी का लाभार्थी मृतक की संपदा है, या लाभार्थी की नियुक्ति नहीं है, तो पॉलिसी का भुगतान वसीयत या निर्वसीयत उत्तराधिकार के तहत बँटेगा। हिंदुओं के लिए निर्वसीयत उत्तराधिकार Hindu Succession Act 1956 से चलता है, जिसकी धारा 6 में 2005 के संशोधन के बाद बेटियाँ जन्म से सहदायिक (coparcener) हैं। वसीयत Indian Succession Act 1925 के तहत है।
यहाँ एक हालिया और महत्वपूर्ण बदलाव है। द्वितीयक स्रोतों के अनुसार Repealing and Amending Act, 2025 (सहमति 20 दिसंबर 2025) ने Indian Succession Act की धारा 213 को हटा दिया है, जो मुंबई, कोलकाता और चेन्नई के पूर्व प्रेसीडेंसी नगरों में हिंदुओं की वसीयत के लिए probate को अनिवार्य बनाती थी। अब probate कानूनी रूप से अनिवार्य नहीं है, हालाँकि बैंक, हाउसिंग सोसाइटी और रजिस्ट्रार व्यवहार में इसे माँग सकते हैं। हमने अधिनियम का पाठ स्वयं नहीं देखा; अपने वकील से इसकी वर्तमान स्थिति पुष्ट कराएँ।
गोपनीयता की दृष्टि से वसीयत का रास्ता सबसे खुला है। probate या उत्तराधिकार प्रमाणपत्र की कार्यवाही अदालत में होती है, जिसमें वसीयत और संपत्तियों की सूची अदालत के रिकॉर्ड में आती है, नोटिस प्रकाशित होते हैं, और कोई भी वारिस आपत्ति कर सकता है। पॉलिसी का अस्तित्व, उसका मूल्य और लाभार्थियों की पहचान इस प्रक्रिया में सार्वजनिक हो सकते हैं। धारा 213 के हटने से यह प्रक्रिया अनिवार्य नहीं रही, लेकिन जहाँ वारिसों में विवाद है, वहाँ यह प्रायः फिर भी होती है।
अपना PPLI संबंधी प्रश्न और उससे जुड़े देशों के नाम बताएँ, ताकि बातचीत सही विषय से शुरू हो सके।
अपना प्रश्न बताएँ →तीसरा विकल्प: ट्रस्ट
तीसरा रास्ता यह है कि पॉलिसी का स्वामी या लाभार्थी एक ट्रस्ट हो। भारत में निजी ट्रस्ट Indian Trusts Act 1882 के तहत बनते हैं; विदेशी ट्रस्ट उस देश के कानून के तहत जहाँ वह स्थापित है। ट्रस्ट के मामले में पॉलिसी का भुगतान ट्रस्टी को जाता है, जो उसे ट्रस्ट डीड के अनुसार लाभार्थियों में बाँटता है या उनके लिए रखता है। ट्रस्ट डीड एक निजी दस्तावेज़ है; उसमें किसी अदालत की कार्यवाही नहीं है, कोई सार्वजनिक नोटिस नहीं, और लाभार्थियों की पहचान ट्रस्टी और लाभार्थियों तक सीमित रहती है।
ट्रस्ट का भारतीय कर पक्ष अलग से समझने का विषय है। द्वितीयक स्रोतों के अनुसार निजी विवेकाधीन ट्रस्ट (जिसमें लाभार्थियों के हिस्से तय नहीं हैं) की आय पर धारा 164(1) के तहत अधिकतम सीमांत दर (MMR) से कर लगता है; ITAT मुंबई की विशेष पीठ ने Araadhya Jain Trust (9 अप्रैल 2025) में माना कि इसमें अधिभार स्लैब के अनुसार लगता है, एकसमान 37% नहीं। मृत्यु लाभ 10(10D) के तहत कर-मुक्त है, इसलिए ट्रस्ट को मिलने वाला भुगतान स्वयं कर योग्य आय नहीं है; प्रश्न उसके बाद ट्रस्ट में रखी गई राशि की आय पर है। विदेशी ट्रस्ट के भारतीय निवासी सेटलर या लाभार्थियों की कर स्थिति एक जटिल और अलग विषय है जिस पर यह लेख कोई निष्कर्ष नहीं देता।
एक और बिंदु: Benami Transactions (Prohibition) Amendment Act 2016 के तहत किसी और के नाम पर रखी संपत्ति ज़ब्त हो सकती है, लेकिन द्वितीयक स्रोतों के अनुसार वास्तविक ट्रस्टी या न्यासी की हैसियत में रखी संपत्ति और उचित रूप से घोषित ट्रस्ट या नॉमिनी इसके अपवाद में हैं। ट्रस्ट की गोपनीयता तभी वैध है जब ट्रस्ट वास्तविक हो, उसकी डीड लिखित हो और उसकी कर-घोषणाएँ नियमित हों।
MWPA 1874: एक पुराना कानून, एक विशेष ट्रस्ट
Married Women's Property Act 1874 की धारा 6 भारतीय जीवन बीमा में एक विशेष ट्रस्ट बनाती है। उसका पाठ: विवाहित पुरुष द्वारा अपने जीवन पर ली गई पॉलिसी, जो "अपने मुख पर" अपनी पत्नी या पत्नी और बच्चों के लाभ के लिए व्यक्त हो, एक ट्रस्ट मानी जाएगी और, जब तक ट्रस्ट का कोई उद्देश्य शेष है, पति के नियंत्रण में, उसके लेनदारों के अधीन, या उसकी संपदा का हिस्सा नहीं होगी। परंतुक: यह लेनदारों को धोखा देने के इरादे से ली गई पॉलिसी की आय से भुगतान पाने के लेनदार के अधिकार को नहीं रोकता। Insurance Act की धारा 39(7) MWPA पॉलिसियों को धारा 39 के नामांकन नियमों से बाहर रखती है, यानी MWPA पॉलिसी में नॉमिनी का प्रश्न ही नहीं उठता; ट्रस्ट ही सब कुछ है।
MWPA का पाठ भारतीय बीमाकर्ता की पॉलिसी के लिए है और यह प्रश्न कि विदेशी बीमाकर्ता की PPLI पर MWPA की घोषणा का क्या प्रभाव होगा, हमारे पास किसी प्राथमिक या द्वितीयक स्रोत से उत्तरित नहीं है; इसे NV मानें और वकील से पूछें। इसका उल्लेख यहाँ इसलिए है कि भारतीय पाठक इसे जानता है और यह दिखाता है कि भारतीय कानून स्वयं पॉलिसी को ट्रस्ट में रखने के विचार से परिचित है।
कौन क्या जान पाएगा: तीनों विकल्पों की तुलना
नॉमिनी या अनुबंधीय लाभार्थी के रास्ते में बीमाकर्ता, लाभार्थी और, CRS के माध्यम से, लाभार्थी के देश का कर प्रशासन जानते हैं। अन्य वारिस तब जानते हैं जब वे दावा करें, और तब अदालत के माध्यम से। जनता नहीं जानती।
वसीयत के रास्ते में, यदि probate या उत्तराधिकार प्रमाणपत्र की कार्यवाही होती है, अदालत, सभी वारिस, नोटिस के पाठक और रिकॉर्ड देखने वाला कोई भी व्यक्ति पॉलिसी के अस्तित्व और मूल्य को जान सकता है। यदि कार्यवाही नहीं होती, तो निष्पादक और वारिस जानते हैं। धारा 213 के हटने के बाद यह रास्ता पहले से कम खुला है, लेकिन विवाद की स्थिति में उतना ही खुला।
ट्रस्ट के रास्ते में ट्रस्टी, लाभार्थी और ट्रस्ट के कर प्रशासन जानते हैं; CRS के तहत ट्रस्ट के controlling persons उनके कर निवास के देशों को रिपोर्ट होते हैं। वारिस जो लाभार्थी नहीं हैं, ट्रस्ट डीड नहीं देखते, जब तक वे अदालत में ट्रस्ट को ही चुनौती न दें। जनता नहीं जानती।
अहमदाबाद के उस परिवार के लिए, बिना किसी सिफ़ारिश के, तर्क का ढाँचा यह है: यदि तीसरे बच्चे के विवाद की संभावना वास्तविक है, तो अनुबंधीय लाभार्थी के रूप में ट्रस्ट, जिसकी डीड में तीनों बच्चों की स्थिति स्पष्ट हो, वसीयत से अधिक निजी और नॉमिनी से अधिक मज़बूत हो सकता है। लेकिन यह मज़बूती ट्रस्ट की वास्तविकता, उसकी घोषणा और उसके कर अनुपालन पर टिकी है, और परिवार के भारतीय तथा विदेशी सलाहकारों की एक साथ राय पर।
स्वामी और बीमित व्यक्ति का अलगाव
PPLI में एक और संरचनात्मक साधन है जो भारतीय परिवारों के लिए उपयोगी है: पॉलिसीधारक और बीमित व्यक्ति अलग हो सकते हैं। NRI बेटा पॉलिसी का स्वामी हो सकता है और भारत का निवासी पिता बीमित व्यक्ति, बशर्ते बीमाकर्ता इसकी अनुमति दे और बीमित व्यक्ति में स्वामी का बीमा योग्य हित हो। इस संरचना में पिता की मृत्यु पर भुगतान बेटे को जाता है, जो स्वामी और लाभार्थी दोनों है, और पिता की भारतीय संपदा का कोई प्रश्न नहीं उठता, क्योंकि पॉलिसी कभी पिता की थी ही नहीं। यह FEMA के विनियम 4 की उस समस्या का भी उत्तर है कि भारत का निवासी नई विदेशी पॉलिसी का स्वामी नहीं बन सकता। गोपनीयता की दृष्टि से इस संरचना में पिता के वारिसों का कोई दावा नहीं बनता, क्योंकि उनके पास दावा करने के लिए कोई संपदा-संपत्ति ही नहीं है। यह विश्लेषण है और इसकी पुष्टि बीमाकर्ता, FEMA सलाहकार और भारतीय उत्तराधिकार वकील तीनों से करानी चाहिए।
यह क्या नहीं है
यह लेख कर विभाग से गोपनीयता की बात नहीं करता; पॉलिसी CRS में रिपोर्ट होती है, Schedule FA में घोषित होती है, और ट्रस्ट के controlling persons भी रिपोर्ट होते हैं। यह किसी वारिस को उसके वैध हिस्से से वंचित करने का साधन नहीं है; जो संरचना वारिसों के कानूनी अधिकारों को धोखे से हराने के लिए बनी हो, वह अदालत में नहीं टिकती, और यह लेख उसकी सिफ़ारिश नहीं करता। यह भारतीय उत्तराधिकार कानून की पूरी व्याख्या नहीं है; धारा 213 का हटना, beneficial nominee की स्थिति और MMR का प्रश्न हमने द्वितीयक स्रोतों से लिए हैं। और यह विदेशी पॉलिसी पर भारतीय बीमा कानून की प्रयोज्यता पर कोई अंतिम राय नहीं है; वह प्रश्न विश्लेषण का है, जिसे हमने वैसा ही कहा है।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
क्या भारत में नॉमिनी को पॉलिसी का पैसा अपना हो जाता है?
Insurance Act 1938 की धारा 39 में 2015 के संशोधन से जोड़ी गई उपधाराएँ (7) और (8) के अनुसार माता-पिता, पति या पत्नी, या बच्चों को नॉमिनी बनाने पर वे beneficial nominee हैं और भुगतान पर उनका लाभकारी अधिकार है। अन्य नॉमिनी के लिए 1984 के Sarbati Devi निर्णय की स्थिति, कि नॉमिनी केवल प्राप्तकर्ता है और पैसा वारिसों का है, प्रासंगिक रहती है। द्वितीयक स्रोतों के अनुसार उच्च न्यायालय इस प्रावधान के दायरे पर विभाजित हैं। विदेशी PPLI में लाभार्थी की स्थिति अनुबंध और बीमाकर्ता के देश के कानून से चलती है।
क्या मुंबई या कोलकाता में वसीयत के लिए probate अब भी अनिवार्य है?
द्वितीयक स्रोतों के अनुसार Repealing and Amending Act, 2025 ने Indian Succession Act 1925 की धारा 213 को हटा दिया है, जो पूर्व प्रेसीडेंसी नगरों में हिंदुओं की वसीयत के लिए probate अनिवार्य करती थी। अब probate कानूनी रूप से अनिवार्य नहीं है, हालाँकि बैंक और सोसाइटी व्यवहार में माँग सकते हैं। हमने अधिनियम का पाठ स्वयं नहीं देखा; वर्तमान स्थिति वकील से पुष्ट कराएँ।
तीनों विकल्पों में सबसे अधिक गोपनीय कौन-सा है?
ट्रस्ट, यदि वह वास्तविक और घोषित है: ट्रस्ट डीड निजी दस्तावेज़ है, कोई अदालती कार्यवाही नहीं, और लाभार्थी जो नहीं हैं वे डीड नहीं देखते। नॉमिनी या अनुबंधीय लाभार्थी का रास्ता भी निजी है जब तक कोई वारिस दावा न करे। वसीयत का रास्ता, यदि probate या उत्तराधिकार प्रमाणपत्र की कार्यवाही होती है, सबसे खुला है, क्योंकि वसीयत और संपत्तियों की सूची अदालत के रिकॉर्ड में आती है। किसी भी विकल्प में कर प्रशासन से गोपनीयता नहीं है।
MWPA 1874 क्या करता है?
Married Women's Property Act 1874 की धारा 6 के तहत विवाहित पुरुष की अपने जीवन पर ली गई पॉलिसी, जो अपने मुख पर पत्नी या पत्नी और बच्चों के लाभ के लिए व्यक्त हो, ट्रस्ट मानी जाती है और पति के नियंत्रण, उसके लेनदारों या उसकी संपदा का हिस्सा नहीं होती, जब तक ट्रस्ट का कोई उद्देश्य शेष है; लेनदारों को धोखा देने के इरादे से ली गई पॉलिसी इसका अपवाद है। धारा 39(7) MWPA पॉलिसियों को नामांकन नियमों से बाहर रखती है। विदेशी PPLI पर इसके प्रभाव का कोई स्रोत हमारे पास नहीं है।
ट्रस्ट में रखी पॉलिसी पर भारत में कर कैसे लगेगा?
मृत्यु लाभ धारा 10(10D) के आठवें परंतुक के तहत कर-मुक्त है, इसलिए ट्रस्ट को मिलने वाला भुगतान स्वयं कर योग्य आय नहीं है। उसके बाद ट्रस्ट में रखी राशि की आय पर, यदि ट्रस्ट निजी विवेकाधीन है, द्वितीयक स्रोतों के अनुसार धारा 164(1) के तहत अधिकतम सीमांत दर से कर लगता है, जिसमें ITAT मुंबई की विशेष पीठ (Araadhya Jain Trust, 2025) के अनुसार अधिभार स्लैब से लगता है। विदेशी ट्रस्ट के भारतीय निवासी सेटलर या लाभार्थियों की स्थिति अलग और जटिल विषय है।
क्या पॉलिसी का स्वामी और बीमित व्यक्ति अलग हो सकते हैं?
PPLI में सामान्यतः हाँ, बशर्ते बीमाकर्ता अनुमति दे और स्वामी का बीमित व्यक्ति में बीमा योग्य हित हो। NRI बेटा स्वामी और भारत का निवासी पिता बीमित व्यक्ति हो सकता है; पिता की मृत्यु पर भुगतान स्वामी को जाता है और पिता की संपदा का प्रश्न नहीं उठता, क्योंकि पॉलिसी कभी उसकी थी ही नहीं। यह FEMA के विनियम 4 के प्रश्न का भी उत्तर है। यह विश्लेषण है और बीमाकर्ता, FEMA सलाहकार और उत्तराधिकार वकील से पुष्टि आवश्यक है।
क्या कोई वारिस विदेशी PPLI के भुगतान को भारतीय अदालत में चुनौती दे सकता है?
दावा किया जा सकता है, विशेषकर यदि वारिस यह कहे कि पॉलिसी मृतक की संपदा का हिस्सा थी या लेनदारों या वारिसों को धोखा देने के लिए बनी थी। विदेशी पॉलिसी में लाभार्थी का अनुबंधीय अधिकार भारतीय नॉमिनी से मज़बूत है, जिससे ऐसे दावे की सफलता की संभावना कम होती है, समाप्त नहीं। जिस संरचना में स्वामी मृतक नहीं था, वहाँ दावे का आधार ही कमज़ोर है। हर मामले में भारतीय और विदेशी दोनों वकीलों की राय लें।
क्या Benami कानून ट्रस्ट या नॉमिनी पर लागू होता है?
Benami Transactions (Prohibition) Amendment Act 2016 के तहत किसी और के नाम पर बिना वास्तविक ट्रस्टी या न्यासी हैसियत के रखी संपत्ति ज़ब्त हो सकती है। द्वितीयक स्रोतों के अनुसार वास्तविक ट्रस्टी की हैसियत और उचित रूप से घोषित ट्रस्ट या नॉमिनी इसके अपवाद में हैं। इसलिए ट्रस्ट की गोपनीयता तभी वैध है जब ट्रस्ट वास्तविक हो, डीड लिखित हो और कर-घोषणाएँ नियमित हों; कागज़ी ट्रस्ट गोपनीयता नहीं, जोखिम है।
स्रोत और प्राधिकार
Married Women's Property Act 1874, धारा 6 (indiacode.nic.in)। Insurance Act 1938, धारा 38 और 39, जिसमें 2015 के संशोधन की उपधाराएँ (7) और (8) (indiankanoon.org); beneficial nominee की स्थिति, Sarbati Devi (1984) और Shakti Yezdani (2023) पर द्वितीयक स्रोत (trilegal.com)। Indian Succession Act 1925 की धारा 213 का Repealing and Amending Act, 2025 द्वारा हटाया जाना, द्वितीयक स्रोत से (khaitanco.com)। Hindu Succession Act 1956 का 2005 संशोधन, Indian Trusts Act 1882, धारा 164(1) और ITAT मुंबई विशेष पीठ, Araadhya Jain Trust v ITO (9 अप्रैल 2025), तथा Benami संशोधन अधिनियम 2016, द्वितीयक स्रोतों से। आयकर अधिनियम 1961, धारा 10(10D) (incometaxindia.gov.in)। विदेशी बीमाकर्ता की पॉलिसी पर भारतीय नामांकन कानून और MWPA की प्रयोज्यता इस लेख में विश्लेषण के रूप में है, किसी स्रोत से पुष्ट नहीं। Income-tax Act 2025 (अधिनियम 30 of 2025) 1 अप्रैल 2026 से प्रभावी है; 1961 की धाराओं के 2025 समतुल्य की पुष्टि कर सलाहकार से कराएँ।
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